September 10, 2025 · 2 min read

Ek Chehra

भीड़ थी हज़ारों की, हर चेहरा था अंजाना,

एक निगाह में छुप गया, दिल का एक अफ़साना।

डिपार्टमेंट के काउंटर पर, जब उसे पहली बार देखा,

मन ने बिना कुछ कहे ही, उसे दिल से अपना माना।

उसने न मुझसे बात की, न आँखों से सलाम किया,

फिर भी उसकी एक झलक ने, दिल पूरा बेक़रार किया।

मैं चुपचाप खड़ा रहा, दिल में एक तूफ़ान लिए,

वो भी आकर बैठ गई, ख़ामोशी की शान लिए।

उसकी ख़ामोशी कुछ कह गई, जैसे कोई गीत अधूरा था,

बिन बोले वो कह गई, जो कहना ज़रूरी था।

फिर वो उठी, चली गई, भीड़ में जैसे खो सी गई,

दिल में मगर वो पल वहीं, ख़ामोशी बनके रो सी गई।

वो लम्हा छोटा सा था, पर एहसास बड गहरे थे,

ना जाने कैसी डोर थी, जो दो अनजानों से बंधे थे।

कल फिर मुलाक़ात हो, या ना हो कोई बात,

भीड़ में मिला वो चेहरा, बन गया मेरी राह का साथ।

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